Wednesday, 18 January 2012

मेघपुष्प


हम सभी जानते हैं श्री कृष्ण   के गरूड्ध्वज रथ में जुते चार दुग्ध धवल अश्वों के नाम—क्रमश: शैव्य,सुग्रीव,मेघपुष्प और बलाहक थे।मेघपुष्प अपने नाम के अनुरूप ही धवल मेघों के पुष्पगुच्छ सा मोहक एवं आकर्षक था।परन्तु यहां मेघपुष्प किसी अश्व का नहीं एक कबूतर का नाम है…।
मैं अपने भाई बहनों एवं माता पिता सहित शहर के एक हिस्से में रहती थी। हमारा मकान कहने को तो शहर में ही था,पर था आबादी से अलग-थलग।मकान पुराने डिजाईन का था।बीच में बडा –सा आंगन,चारों तरफ से कमरों,बरामदों ,गलियारों से घिरा।बाहर से आने पर दो-चार सीढियां उतरते ही पहले आंगन मिलता।
तब मैं कालेज में पढती थी।एक दिन शाम को लौटकर घर आई तो पिताजी आंगन में बैठे थे।उतरती शाम के संधि प्रकाश में उनका चेहरा खिला-खिला सा लगा।मुझे देखते ही बोले-“देखो लडकी,मेघपुष्प।“मैंने देखा –एक सुन्दर,सफेद,नितांत स्वच्छ धवल कबूतर उनकी कुर्सी के ठीक पास में गेहूं के दाने चुग रहा था।बहुत ही प्यारा,बिल्कुल निर्दोष,बेहद खूबसूरत पंखों वाला।मैंने धीरे से बैठकर पुचकारा,तो वह डर गया।फुदक-कर जरा दूर खिसक लिया।फिर अपनी ग्रीवा घुमाकर उसने मुझे कोमल नजरों से देखा।मैं मनोविज्ञान की छात्रा कभी नहीं रही।रहती भी तो एक पक्षी के नयनों की भाषा तो नहीं ही पढ पाती।परन्तु उसकी नजरें बडी आत्मीय लगीं।मैंने कहा-:पापा,यह तो कमल नयन भी है !पिताजी हंसने लगे।
मैं भी वहीं पालथी मार कर बैठ गई। हमारा कालेज घर से दूर था। आने-जाने में घंटा भर लग जाता था। हम पैदल ही आते-जाते थे। तब हम बात-बेबात सवारियां नहीं लिया करते थे। यूं कहें कि जरूरत ही नहीं महसूस होती थी। न हाथों में ज्यादा पैसे ही हुआ करते थे।थोडा थक तो जाती ही थी। ठंढे पक्के आंगन में ऐसे बैठने में आराम –सा लगता था।अब मैने पूछा—“यह कहां से आ गया ?” तो पिताजी उत्फुल्ल होकर बताने लगे,जब मैं आफिस से आया,यह बाहर सीढियों पर था। मैंने पुचकारकर हाथ बढाया,तो सीधे पास चला आया। लगता है-पुरानी जान-पहचान है हमारी।मैंने कहा-“हां-हां,क्यों नहीं ?जान गया होगा कि आफिस से लौटते कुछ –न-कुछ लाये ही होंगे !
तभी मां प्लेट में पकौडियां ले आई।मैं पकौडियां खाने लगी।तब तक मेघपुष्प का दाना भी खत्म हो गया था।मैं उठकर और दाने लाने चली गई। बरामदे के एक कोने में मिट्टी के दो छोटे बर्तन हमेशा रखे होते थे।मां जब भी चावल पकाने जाती,एक मुट्ठी चावल निकालकर एक बर्तन में रख देती। दो-चार दिन बीचकर कोई-न-कोई भिखारी दरवाजे तक आ ही जाता। ये चावल उसे ही देने के काम आते। दूसरे बर्तन में गेहूं के टूटे दाने होते थे।जब भी गेहूं पिसवाने के लिए मां फटकने बैठती,टूटे छोटे दानों को उठाकर इसी बर्तन में रख देती। ये दाने तो बस चिडियों के लिए ही होते॥
मैं एक मुट्ठी चावल निकाल ही रही थी कि पिताजी बोले-“यह चावल नहीं खाएगा,इसे गेहूं के दाने दो।“मैंने आश्चर्य से पिताजी और मेघपुष्प दोनों को देखा। फिर बिना किसी सवाल जबाब के गेहूं लाकर बिखेर दी। मेघपुष्प चुगने लगा। चाय पीकर पिताजी उठे। उन्हें इसके लिए रात्रि विश्राम की व्यवस्था करनी थी। उन्होंने एक पुराने मिट्टी के घडे को बीच से फोडकर दरबा बनाया।बाथरूम के दरवाजे के ऊपर मुंडेर के नीचे भली प्रकार से टांग दिया। थोडे घास-फूस बिछाकर बडे जतन से उठाकर उसे उसमें बिठा आए। दीवार पर टंगा यह बसेरा आठ –नौ फीट की ऊंचाई पर था।मैंने अंदेशा जताया—बिल्ली चढ गई तो ? लेकिन ऊपर से छत की मुंडेर जरा चौडी थी। न तो ऊपर की तरफ से,न ही जमीन की तरफ से,दोनों ही ओर से बिल्ली की पहुंच से दूर था,उसका यह नया-नवेला घर।
हम निश्चिंत हुए…॥
रोज सबेरे मेघपुष्प आंगन में आता,मुट्ठी भर दाना खाता,फिर जाने किस दिशा में उड जाता।शाम होते ही वापस लौट आता।थोडी देर आंगन में इधर-उधर घूमता और बिखरे अन्न कणों को चुगता। आंगन के एक कोने में बेली का पुराना झाडीनुमा पौधा उगा हुआ है,  जो बरसों से परिवार के एक सदस्य की तरह है।उसकी जडों के पास चीनी मिट्टी के बर्तन में पानी रखा होता।मेघपुष्प पानी पीता और उडकर अपने बसेरे में जा बैठता।
दो तीन दिन ही बीते होंगे कि हमने देखा—आंगन में तीन कबूतर उतरे हुए हैं। अच्छा लगा। तो महाशय ! अपने दोस्तों को भी बुला लाए महीना भर होते-न-होते आंगन में नौ-दस कबूतरों की टोली जमा होने लगी। मिट्टी के चार-पांच घडे दीवार पर टंग गए। खूब सबेरे से ही आंगन में गुटर-गूं-गुटर-गूं की धूम मचने लगी।
मां गेहूं धोकर सूखने को डालती,तो सभी जाने कहां से आ-आकर टूट पडते। मां खीझ उठती। पर पिताजी हंसते हुए कहते-तुमने दिया नहीं होगा खाने को,तो क्या करेंगे?हम सब हंस देते।
एक दिन कुछ आवश्यक काम से पिताजी को शहर से बाहर जाना पडा। जाते-जाते छोटे भाई को ताकीद कर गए-कबूतरों का ध्यान रखना।बारिश के दिन हैं,उनके दरबों में पानी न घुसे।
रात हुई।सोने से पहले छोटा भाई बांस की सीढी लेकर निगरानी कर आया। छत की मुंडेर पर एक लम्बा प्लास्टिक का परदा डाल आया,जिससे पानी का छींटा भी अंदर न जा सके। हम सब निश्चिंत होकर सोए।
रात भर बारिश होती रही। कच्ची छतों वाले मकान में बारिश का शोर बाकी किसी भी आवाज को सुनने नहीं देता। हम बेसुध होकर सोए रहे। रोज सबेरे सबसे पहले उठने वाले पिताजी तो थे नहीं ! हम देर तक सोए रहे। मानों सबेरा ही देर से हुआ हो।
अचानक मां की हाय- तौबा सुनकर मैं हड्बडाकर उठ बैठी। दरवाजा खोलते ही जो नजारा दीखा—दिल धक्क से रह गया। मेरे कमरे के दरवाजे के पास ,एकदम पास ढेरों सफेद पंख गिरे हुए और थोडी ही दूरी पर रक्त की कुछ बूंदें !!!
क्षणांश में ही सारी बातें समझ में आ गईं ।
ये पंख मेघपुष्प के ही थे! सफेद-बेदाग !!एक निरीह पंछी के !!!मूक-बेजुबान-प्राणी के !!!!
रात बिल्ली का आक्रमण हुआ होगा ।पिताजी का कमरा कबूतरों के दरबे के बिल्कुल सामने था,लेकिन इन अबोध प्राणियों को पता था कि आज वे घर पर नहीं हैं।लम्बी दूरी तय कर ,अपने बचाव के लिए व्याकुल होकर ,बारिश में भींगते,रात के अंधेरे में बाध्य होकर, उडकर मेरे कमरे तक आने वाले नन्हे प्राणियों के पंखों की फडफडाहट तक मैं न सुन पाई।दुश्मन बारिश की बूंदों ने कुछ भी सुनने नहीं दिया।इनकी कातर पुकार का तो आभास भी नहीं मिला।काश ! आज दरवाजा ही खुला छूट गया होता !!मैं एक अपराधबोध में डूबी जारही थी।इन्होंने मुझे ही पुकारा,और भी तो लोग थे घर में,मेरे ही द्वार तक आए।क्यों।?
मैं बेखबर सोई रही।प्राणभय से बंद दरवाजों तक आए निरीह प्राणी बारिश में जाने किधर-किधर भटकते फिरे होंगे,कहां छुपकर अपनी जान बचाए होंगे !हमारे मेघपुष्प का हाल तो आंखों के सामने ही था।यूं ही काल के गाल में समा गया !!
अब हमारा ध्यान उनके दरबों की तरफ गया…अखिर चूक हुई कैसे ?
बारिश से बचाव का उपाय करने के बाद सीढी को वहां से हटाने का ख्याल किसी को नहीं रहा।मौत उसी सीढी से होकर उन तक पहुंच गई
जो उनकी हिफ़ाजत के लिए रखी गई थी ।बचपन में पढी कहानी याद आ गई “रक्षा में हत्या”। यह तो बिल्कुल उसी की पुनरावृति हो गई।
सबकी आंखें नम हो आईं।सब मन ही मन सोचते रहे कि पिताजी क्या कहेंगे।?दोपहर को ही वे वापस आ गए।सबकी असामान्य सी चुप्पी पर उन्होंने गौर भी किया होगा पर बोले कुछ नहीं।
शाम होते होते कई कबूतर जिनकी जानें बच गई थीं,आंगन में आ गए।उनकी गुटर-गूं गूंजने लगी।बस,मेघपुष्प नहीं आया।पिताजी की नजरें यहां से वहां तक खोजती रहीं…किसे ?सभी समझ रहे थे,पर किसी ने कुछ भी चर्चा नहीं की।मेरी सबसे छोटी बहन स्कूल से आते ही दौडकर उनकी गोद में चढ गई और अपनी तोतली बोली में जितना जान समझ सकी थी……कहानी सुनाने लगी।
वह दिन और आज का दिन।फिर हमने कभी किसी भी पंक्षी को पालने की हिम्मत नहीं की।बरसों बीत गए।एक बार मेरी बेटी जिद्द कर बैठी—“नानाजी,हमें तोता मंगा दीजिए”।तब पिताजी ने इतना ही कहा-:नहीं बेटा,अनबोलते पंक्षी को बांधकर नहीं रखना चाहिए !!

Saturday, 7 January 2012

अनूठा रिश्ता

नदियों ,पर्वतों झरनों और वनों से घिरा हरा-भरा हमारा झारखंड।मांदर की थाप और नागपुरी गीतों पर थिरकते यहाँ के निवासी ।ये भाग्य से ज्यादा अपने कर्म पर विश्वास करने वाले ,कड़ी मेहनत करने वाले और पक्का इरादा रखने वाले हैं । कर्मा पर्व पर वृक्ष करम  ( जो कि कर्म का प्रतीक है ) की डाल की भक्ति भाव से पूजा-अर्चना करना और परिश्रम का यथोचित फल मिलनेकीकामना करना इसी बात का तो प्रतीक है ।
झारखंड राज्य के उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के मुख्यालय हजारीबाग को हजार बागों का शहर कहा जाता है। कभी यहाँ आम केहजारों बाग हुआ करते थे तथा हजारों की संख्या में बाघ भी पाएजाते थे।क्यों न हों ,ये चारों दिशाओं से वन सम्पदाओं से घिरा
हुआ जो है। जहाँ तक निगाहें उठें हरियाली ही हरियाली ।इन्हीं वनों की देन है कि यहाँ बारिश खूब होती है। सालों भर खुशगवारमौसम होता है। कभी ज्यादा गरमी नहीं पड़ती ।
शहर से 26 किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय उच्च पथ 100 पर पूरब की ओर चलते हुए टाटी झरिया प्रखंड से एक किलोमीटर पहले हमेंएक वन प्रदेश मिलता है। छोटा –सा वन खंड“दुधमटिया”।दुध-मटियासखुआ के पेड़ों का घना जंगल है।इसकी विशेषता यह है ,कि प्रत्येक पेड़ लाल-पीले कच्चे धागों में लिपटा किसी पवित्र बंधन से बंधा देवतुल्य लगता है।प्रत्येक वर्ष 7 अक्टूबर को हजारों की संख्या में ग्रामीण (स्त्री,पुरुष-
बूढ़े बच्चे सभी ) ढोल ,मंजीरे लेकर गीत गाते हुए यहाँ आते और भावनाओं के फूल अक्षत चढा कर मंत्रोच्चार के साथ कच्चे धागे सेप्रत्येक पेड़ का रक्षाबंधन करते हैं ।दिन भर उत्सव का माहौल रहता है। पेड़ों को सजाया जाता है,झंडी पताके लगाए जाते हैं।स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।गाँव की पूरी आबादी इस वन प्रदेश को सुशोभितकरती रहती है।दिन भर मेला लगा रहता है।सुबह से शामतक स्त्रियों के मधुरगीतों और बच्चों की मीठी किलकारियोंसे वन प्रांगण गुंजायमानरहता है।अब तो जिला प्रशासन और वन विभाग ने भी पूरे प्रमंडल में ऐसे आयोजनों कोमान्यता दे रखी है।
प्रकृति हमारी सदा सर्वदा हितैषी रही है।प्राणदायिनी हवा,जल भोजनऔषधि सभी के लिए हम प्रकृति पर आश्रित रहते हैं।प्राण रक्षकसंजीवनी प्रकृति की ही देन है।
रक्षाबंधन आपसी प्यार के बंधन का प्रतीक है।स्निग्ध और नि;स्वार्थ प्रेम का।फिर पेड़ों के साथ रक्षाबंधन ,ग्रामीणों की भोली-भाली आस्था का वनों के साथ अटूट रिश्ता कायम करता है।जहाँ ग्रामीण इन वनों को कभी किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुँचाने कासंकल्प लेते हैं वहीं ये पेड़ आजीवन शुद्ध वातावरण और स्वच्छ वायु प्रदान करते रहने का मौन –मूक वचन देते हैं।बारिश केदिनों में बादल जब उमड़ घुमड़ कर आते हैं ,इन वनों में झूम कर बरसते हैं। वर्तमान समय में रक्षाबंधन कर वन सम्पदा को बचाने एवं पर्यावरण की रक्षा करने का यह उदाहरण कई जगहों पर देखनेको मिलता हैं।यह प्रयास वाकई सराहनीय है।जंगलों और गाँवों में रहने वाले हमारे ग्रामीण भाई-बन्धुओं कीसरलता को धर्म के आवरण में लपेट कर हमारे वनों कोबचाने का यह विचार अनुकरणीय भी है;और यह उत्तम विचार देन है –एक सरकारी स्कूल के आदरणीय शिक्षक श्री महादेव महतो की,जिनकी बुद्धि परायणता ने बिष्णुगढ़ के क्षतिग्रस्त जंगल डहरभंगा को बचाने का संकल्प लिया।
उनका यह अनुष्ठान कारगर हुआ और वनों की रक्षा का अचूक सूत्र बना।आज आलम यह है कि जिले के 45 गाँवों में 22 हजार एकड़जंगल फिर से लहलहा उठे हैं।1995 से प्रारम्भ इस अभियान में हजारों लोग जुड़ते चले आ रहे हैं।
आप जब भी हजारीबाग से गिरिडीह बगोदर की राह जाएँ,कुछ पल दुधमटिया वन क्षेत्र के पास अवश्य रुकें। दो पल ठहर कर वहाँ कीहवा में रची बसी पवित्र भावनाओं को महसूस करें,आप अवश्य कह उठेंगे –अनूठा रिश्ता है यह !!   

Friday, 6 January 2012

अमरनाथ की यात्रा


जय बाबा बर्फानी---बड़ी ही शुभ घड़ी थी जब हमने अनायास अमरनाथ की यात्रा की योजना बना डाली.।हम स्टेट बैंक हजारीबाग शाखा के 10 सदस्य युनाइटेड बैंक के 2 तथा 2 अन्य ,कुल मिलाकर 14 सदस्यों की टोली  जिसमें हम दोनों पति-पत्नी भी शामिल थे , 22/06/2008 को बड़काकाना रेलवे स्टेशन पर टाटा-जम्मू तवी के इंतजार में खड़े थे ।लगभग 40 घंटे के सफर के बाद हम 24/06/08 को जम्मू पहुंचे। पर्यटक स्वागत केन्द्र में दोपहर विश्राम के बाद हमलोग शाम को रघुनाथ मंदिर गए। मंदिर के  विस्तृत परिसर में श्री राम जानकी की सुन्दर प्रतिमायें हैं।साथ में स्फटिक एवं ग्रेफाइट के विशाल शिवलिंग तथा अनेकों  देवी –देवताओं की पिण्ड स्वरूप स्थापना मंदिर को भव्य और दर्शनीय बनाती है। हम संध्या आरती में भी शामिल हुए।
       सबेरे हमारी यात्रा सुमो के द्वारा पहलगाम के लिए शुरु हुई।जम्मू से पहलगाम 270 कि.मी. की दूरी पर है।यह यात्रा बड़ी ही सुखद थी।हर तरफ हरियाली,ऊँचे –ऊँचे पर्वत और तवी नदी की साथ-साथ बहती हुई वेगवती धारा।पर्वत से उतरकर नीचे नदी तक असंख्य छोटी-छोटी धाराएं आती हैं जो साथ मिलकर मचलती हुई,पत्थरों से टकराती राह बनाती लगातार साथ साथ बहती रहती हैं।प्रकृति अपने सभी रूपों में नयनाभिराम होती है।बात चाहे पर्वतों की हो या नदियों झरनों की,पेड़ पौधों की हो या सुबह शाम की मनोहारी छटा की ,सभी अद्वितीय लगते हैं।
       हम ऊधमपुर होते हुए पाटनी टॉप पहुँचे। पाटनी टॉप बादलों से ढंका एक छोटा परंतु अत्यंत खूबसूरत हिल स्टेशन है।यहाँ से गुजरते हमारे बदन को भी बादलों ने नरमी से छुआ।आगे बढ़ने पर कुद से हमने सोहन पापड़ी सरीखी एक स्वादिष्ट मिठाई (पत्तीसा) खरीदी । रास्ते भर पर्वत पर पाए जाए वाले फलों का स्वाद चखते ,स्थानीय लोगों की वेश-भूषा का अवलोकन करते ,बनिहाल दर्रे से गुजरकर हम जवाहर सुरंग के पास पहुंचे।पौने तीन किलोमीटर लम्बी यह सुरंग पहाड़ों को काट कर बनी अब तक की सबसे लम्बीसुरंग है।भीतर घुप्प अंधेरा ,गाड़ियाँ बत्ती जला कर साँस रोके चुपचाप गुजरती हैं।हर तरफ सैनिकों की चुस्त निगाहों का एहसास होता रहा।यहाँ से अनंत नाग होते हुए हम पहलगाम पँहुचे।
        शाम होते-होते हम पहलगाम की धरती पर थे। लिद्दर नदी की धारा को छूकर आती ठंढी हवा बदन में ताजगी का संचार कर रही थी।यहाँ अनेक लंगरों की व्यवस्था थी। भजन कीर्तन के स्वरों के साथ गरमा-गरम भोजन ,पकवान मिठाईयां सभी कुछ उपलब्ध थे।यात्रियों का जत्था पहुँचता जा रहा था,हर तरफ चहल-पहल व्याप्त थी।यहाँ यात्रियों के लिये केसर मिले दूध की भी व्यवस्था थी जो शरीर को गर्म रखने और थकान उतारने में मदद करता है।हम तम्बुओं में ठहरे।तंबुओं में कम्बल रजाइयां मामूली शुल्क पर उपलब्ध थे।सबेरे नहा धो कर हम यात्रा के लिए तैयार होकर हल्के नाश्ते के बाद चल पड़े।पहलगाम से चंदन बाड़ी की दूरी 16 किलोमीटर है।छोटी –छोटी गाड़ियाँ लगातार यात्रियों को गंतव्य तक पँहुचाती रहती हैं।रास्ते भर पर्वत की दुर्गम चढाई का रोमाँच होता रहा।पतली,संकरी इकहरी सड़कें सीधी खड़ी चढाई पर चढती हुई और ठीक नीचे बहती लिद्दर नदी की धारा।प्रकृति की हरी भरी रूप सज्जा का दर्शन करते रोमांचित होते हमारी यात्रा जारी रही।कभी हमारी गाड़ी सड़क के एकदम किनारे को छूकर गुजरती तो मन सिहर उठता ।भगवान न करें ,कुछ अनहोनी हो ही गई तो हम सीधे हजारों फीट नीचे नदी की धारा में सैर करते नजर आएंगे।ख्याल आता-हमें मौत से शायद डर न लगे पर जिन्दगी का मोह नहीं छूटता।घर याद आता,बच्चे याद आते। हे शिव ! हम तुम्हारी शरण में हैं।
     चंदनबाड़ी में सजी हुई अनेकों दुकानें थीं जिनमें यात्रा की जरूरतों का हर सामान उपलब्ध था।हमने सामान ढोने लके लिए किराए पर पिट्ठू लिए।सहारे के लिए हाथ में लाठियाँ लीं जिनमें नीचे की तरफ लोहे टँके थे जो रास्ते भर हमारे कदमों को सहारा देते रहे ,फिसलन भरी राहों पर सम्भालते रहे ।हमारी पीठ पर छोटे छोटे बैग थे जिनमें जरूरत के सामान बरसाती,जैकेट,गर्म कपड़े ,मफलर टॉर्च और दवाईयाँ थी.।हजारों यात्रियों का यह जत्था बाबा बर्फानी के जयघोष के साथ मन में अपार ताकत और साहस भरता हुआ नदी की धाराओं को छूते ,उनमें घुली-मिली संजीवनी का रसपान करते चल पड़ा और शुरु हो गई शिव की महिमा मंडित पर्वत शिखरों की छटा और खुल कर किलकती छलकती नदी का पावन स्वरुप तथा पूरे यौवन के निखार के साथ खिली-खिली प्रकृति के रुप का रसपान ।आँखें नहीं थकती थी.जिधर भी नजरें उठी,सुन्दरता ही सुन्दरता ।साथ में पर्वतारोहण का रोमांच एवं धर्मस्थली की पावन यात्रा का सुखद संयोग और सब से बढकर हमारी टोली जिसका हर सदस्य आपसी सहयोग और स्नेह की भावना से बंधा एक दूसरे का ख्याल करता हँसता बतियाता चलता रहा।
       “जय भोले”—पास से कोई घुड़सवार जयकार करता गुजरता और सभी एक साथ जबाब देते जय भोले,जय बाबा बर्फानी।अपार आनन्द ।असीम हर्ष ।हम लोग पिस्सू टॉप की ओर बढ रहे थे ।जैसा कि नाम से विदित है पिस्सू टॉप की चढाई इतनी सीधी और खड़ी है कि पिस्सू की भाँति सरक कर ही चला जा सकता है |धीरे-धीरे सधे और छोटे कदमों से चलकर हम लंगर तक पहुँचे ।यहाँ का माहौल बड़ा आह्लाद कारी था ।गीत-संगीत की धुन पर थिरकते ,नृत्य करते भक्तों की टोली जो घड़ी दो घड़ी थिरक कर अपने पाँव की थकान मिटाते और मस्त होते हैं ,यह नृत्य जहाँ थके पाँव के लिए व्यायाम का काम करता है वहीं यात्री गण नई ताजगी एवं स्फूर्ति का संचार पाकर आगे चल पड़ते हैं।हल्का भोजन लेकर हमलोग आगे चल पड़ॆ आज की हमारी यात्रा 14 किलोमीटर की थी।
हम शेषनाग झील की तरफ बढ रहे थे ।पर्वतों की दिनचर्या कुछ अलग होती है आठ बजे तक उजाला व्याप्त रहता है।शाम की घड़ियां थोड़ी ही होती हैं अचानक धुंधलका बिखरने लगता है।
      “अमरनाथ”भगवान शिव की उपाधि है यही नाम उस पर्वतीय स्थान को भी दियागया जहाँ पवित्र गुफा में मई –जून के महीने में प्राकृतिक रूप से बर्फ के शिवलिंग की आकृति तैयार हो जाती है ,जिसके दर्शनार्थ हजारों लाखों श्रद्धालु नदी-पर्वत लांघते राह की कठिनाईयों को झेलते धूप, वर्षा सहते चले आते हैं।जिनकी श्रद्धा ,आस्था और भक्ति इस आकृति को शिव का स्वरूप प्रदान करती है।प्रचलित कथा है कि भगवान शिव से माता पार्वती अमरत्व प्राप्त कराने वाली अमर कथा सुनाने की जिद्द कर बैठीं।भगवान माता को लेकर ऊँचे हिमालय की तरफ चल पड़े सबसे पहले रास्ते में शेषनाग को एक झील में छोड़कर वे आगे बढे यही शेषनाग झील है।किंवदंती है कि कभी-कभी इस विशाल गहरे झील के ठहरे हुए पानी में हलचल सी होती है।शायद शेषनाग की तंद्रा तब टूटती होगी और वे करवट बदलने का प्रयास किया करते होंगे।बहरहाल हमें ऐसी कोई हलचल नहीं दिखाई दी। शांत कज्जल पानी निगाहों को हटने की इजाजत ही नहीं देता।
       कथा है कि शेषनाग झील से आगे बढने पर पंचतरणी की पावन धारा ने शिव पार्वती के चरण पखारे।पवित्र गुफा में पहुँचकर भगवान तो मृग छाल बिछा कर बैठ गए और भवानी आधा लेट कर कथा सुनने लगीं।सुनते-सुनते उन्हें नींद आ गई।कबूतरों का एक जोड़ा चुप-चाप बैठा कथा सुनता रहा और साथ में हूँ –हूँ की हुंकारी भी भरता रहा। कहते हैं कि यही कबूतर अमर कथा सुनकर अमर हो गए ऐसा न होता तो 14000 फीट की ऊँचाई पर इतने ठंढे वातावरण में जहाँ अन्य कोई भी पशु पक्षी नहीं मिलते ,गुफा और उसके इर्द गिर्द ये कैसे दिखाई देते.?शेषनाग पहुँचते पहुँचते रात घिर आई हमने तंबुओं में विश्राम किया और सुबह हम जब जागे तो आँखें फटी की फटी रह गईं।लगा रात भर बर्फ की बारिश होती रही हो ,हर तरफ बर्फ ही बर्फ ।बर्फीली चादर ओढेपर्वत और उनपर पड़ती सूर्य की सुनहरी किरणें-स्वर्गिक नजारा,अपार सौंदर्य ।सामने त्रिशूल पर्वत दिखाई दे रहे थे । त्रिशूल के आकार के तीन शिखर जिनपर बर्फ जमी हुई थी।
शिव की उपस्थिति का एहसास दिलाते हुए ये नजारे मन को आनन्द लोक की सैर करा रहे थे। हम इस सुख का आँखों से,रोम –रोम से अनुभव करते पंचतरणी की तरफ बढ चले।पहाड़ों का मौसम,अभी –अभी खिली हुई धूप थी.न जाने कहाँ से बादल उड़ते चले आए और देखते ही देखते सभी पर्वत बादलों की ओट में आ गए।बादल घनीभूत हुए और बारिश होने लगी।पानी की ठंढी बूंदें ,हवा और पर्वत की राह---फिर थोड़ी ही देर में धूप निकल आई।आज की चढाई थोड़ी कठिन थी.हम पूरी चढाई के सबसे उच्चतम शिखर महागुनस टॉप की ओर जा रहे थे।इसे गणेश टोप के नाम से भी जाना जाता है।कथा केअनुसार यहीं श्री गणेश जी को छोड़कर शिव-पार्वती आगे बढ गए थे।यहाँ ऊँचाई 14500फीट है।यहाँ हवा भी थोड़ी विरल है।आक्सीजन की मात्रा की कमी से थोड़ी थकान हो आई।हमारे कुछ साथी तो आगे बढ गए थे।हमारी साँसें फूलने लगीं ।हमारे साथियों में से एक ने छोटा आक्सीजन सिलिंडर साथ रख लिया थाजो हमारे साथ साथ ही चल रहे थे,वे पहले भी यात्रा कर चुके थे।शायद उन्हें हमारे लिए ऐसी आशंका भी मन में रही हो।
हम 2-2 मिनट आक्सीजन का सेवन कर आगे पोषपत्री पहुँचे।यहाँ पहुँचते पहुँचते मौसम खराब होने लगा।हवा चलने लगी और बूँदा बाँदी शुरु हो गई।हमारे आठ साथी आगे निकल गए थे।पहाड़ पर चढने के बाद से ही हमारे मोबाईल फोन की सेवा समाप्त हो गई थी।आपस में कोई सम्पर्क नहीं बन पा रहा था।हमने मिलकर तय किया कि दो साथी आगे बढकर  टोली के पास पहुँचे और शेष चार जिनमें हम पति-पत्नी भी थे यहीं विश्राम करें।हम पोषपत्री के विशाल लंगर में ठहरे। यहाँ की व्यवस्था तो देखते ही बनती थी।शिवसेवक सेवा दल दिल्ली का लंगर था। हजारों की संख्या में कम्बल ,जूते ,जैकेट दवाएं भोजन सभी कुछ। साथ में सेना का सख्त पहरा।पूरी यात्रा के दौरान चप्पे-चप्पे में हमारे सैनिकों की उपस्थिति का वर्णन नहीं करना घोर अपराध होगा।हमने जिधर भी निगाह उठाई हमारे सैनिक धूप,वर्षा ,खराब मौसम की परवाह किए बगैर मुस्तैदी से तैनात मिले।यात्रियों का हर कदम हमारे सैनिकों का ऋणी है। उनकी बदौलत ही यात्रा सम्भव हो पाती है। इन दुर्गम चढाईयों में हजारों लाखों यात्री उनकी मदद से ही यात्रा कर पाते हैं,जो यात्रा शुरु होने के पहले से ही बर्फ की चादर काट-काट कर हमारे लिए रास्तातैयार करते हैं।प्रत्येक यात्री पर उनकी निगाह रहती है,कहीं कोई मुसीबत में न फँसे।कभी किसी बच्चे को गोद में उठाकर चढाई पार कराते कभी किसी बुजुर्ग को सहारा देकर ले जाते,आँखें भर आतीं।हमारे ये सैनिक अपने बाल-बच्चों,परिवार से दूर इतनी ऊँचाई पर हमारे लिए कितना कष्ट उठाते हैं।उन्हें शत-शत नमन।
मौसम में जरा भेए सुधार नहीं हुआ ,दूसरे दिन दोपहर एक बजे तक झमाझम बारिश होती रही॥रास्ते फिसलन भरे और कठिन हो चले।यहां यह बता दूं कि सफर आप पैदल तो तय करते ही हैंचाहें तो घोडा या पालकी भी ले सकते हैं,जो बहुतायत से उपलब्ध रहते हैं।लगभग 2 बजे यात्रा आरम्भ करने की सूचना मिली। हम जय भोले कहकर सैनिकों और सेवा दल के सदस्यों से विदा लिए।टेढे-मेढे गीले रास्तों पर चलते नदी की अनेक धाराओं को पार करते हम पंचतरणी की तरफ बढ चले।बारिश के बाद प्रकृति   का धुला-धुला रूप बहुत ही मनमोहक होता है।इस अद्वितीय सौंदर्य का अवलोकन करते हम चलते रहे। आज हमने 6 किलोमीटर की यात्रा कीऔर पंचतरणी पहुंचे,जहां हमारे 2 साथी हमारा इंतजार कर रहे थे,शेष सभी आगे की यात्रा पर चल पडे थे, हमें सकुशल देखकर उनके चेहरे खिल उठे।इन दुर्गम रास्तों पर कहीं भी कुछ भी अनहोनी तो हो ही सकती है।मन तो मन है अच्छी बुरी आशंकाओं से घिरा रहता ही है।पंचतरणी नदी कहीं कहीं बर्फ से ढकी ,कहीं धीमी,कहीं मचलती,हुंकारती।ठंढा बर्फ का पानी-छू कर लगता उंगलियां जम जाएंगी।
कहते हैं यहां भगवान की जटाओं से भगीरथ गंगा पांच धाराओं के रूप में निकली थी। इन्हीं पांच पावन धाराओं को साथ लेकर चलती,यह पर्वतों की रानी अद्भुत सौंदर्य बिखेरती चलती है। पंचतरणी के ठीक बगल में ही लंगर की व्यवस्था थी।इन लंगरों में दवा और चिकिस्ता की भी सुविधा होती है,फिर भी यात्री छोटी मोटी दवाएं साथ लेकर ही चलते हैं।रात्रि विश्राम के बाद हम सबेरे अमरनाथ की गुफा की ओर निकल पडे। पतले दुर्गम रास्तों पर कतारबद्ध हजारों यात्री रंग बिरंगे कपडों में सुसज्जित, जिनमें बुजुर्ग बच्चे अपाहिज सभी शामिल थे। ह्र्दय की धडकनों में शिवमय जगत की वास्तविकता को महसूस करतेजय भोले,जय बम भोले के जयघोष के साथ लगातार चलते रहे। हमारा काफिला 10 बजते बजते पवित्र गुफा के समीप आ पहुंचा।यहां तंबुओं की व्यवस्था थी। चारों तरफ सजी हुई रंग बिरंगी दुकानें थी।और एकदम सटकर बहती हुई अमरावती नदी की धारा॥जो नि:संदेह शिव के चरणों को धोकर चली आ रही थी,अन्यथा इतना न इतराती…अमरावती की निर्मल धारा में स्नान कर साप्फ़ स्वच्छ कपडों में हाथ में बेलपत्र  पुष्प प्रसाद लेकर हम दर्शन को चल पडे।एक डेढ किलोमीटर की सीधी खडी चढाई को पार कर हम सीढियों तक पहुंचे।लगभग 600 सीढियां हैं। (यहां सीढियों तक हेलिकाप्टर सर्विस भी उपलब्ध है आप चाहें तो बाल टाल से सीधे गुफा तक 5-7 मिनट में मात्र 3200/= में आ सकते हैं । पर यात्रा का आनन्द तो अपने पांव पर चल कर आने में ही है और प्रकृति  का सौंदर्य भी खुले आसमान तले चलकर ही प्राप्त होगा) सीढियां चौडी और करीने से बनी हुई हैं।
यहां से पूरी व्यवस्था सैनिकों के हाथ में है। कतार बनाकर यात्री आराम से दर्शन करते और वापस चले आते हैं।कहीं कोई अव्यवस्था नहीं,कोई हडबडी,ठेलमठेल नहीं…सब कुछ सधा और संयत।ऊपर मंदिर से लगातार घंटियों की आवाज आ रही थी॥आंखें दर्शन को आतुर हो रही थीं॥पंचतरणी से गुफा की तरफ आते व्क्त हमें रास्ते में एक बुजुर्ग सैनिक मिले थे जो दर्शन कर लौट रहे थे ,उन्होंने हमसे कहा था कि आप बहुत भाग्यशाली हैं जो ऐसे समय में आए।1941 के बाद लगभग 67 वर्षों के अंतराल पर शिव अपनी पूरी कलाओं के साथ बिराजमान हैं॥पूरा का पूरा दरबार सजा है,भगवान तो हैं ही,माता पार्वती,श्री गणेश और नन्दी भी बिराजे हुए हैं।मन तभी से पंख लगा कर उडा आ रहा था।पांव दुगुने उत्साह से बढ रहे थे। गुफा के द्वार तक पहुंचते पहुंचते हम अपने आप को भूल गए।कतार बद्ध होकर हम गुफा में प्रवेश करने लगे।घंटियों की मीठी आवाज से भगवान को जगातेहुए,पुकारते हुए हम धडकते ह्र्दय और उन्मत्त कदमों से आगे बढते रहे।
    ठीक सामने शिवलिंग की लगभग 11 फीट ऊंची आकृति दीख पडी॥क्रपा  बाबा बर्फानी।साकार शिव के साक्षात दर्शन।रोम रोम सिहर उठा।शत नमन शिव !शत नमन परमेश्वर !!अद्रश्य नजरों से सारे संसार को निहारते शंकर भगवान॥मन एकाएक शांत हो गया।मीठे एहसास और अपूर्व संतोष की अनुभूति हुई।
शिव जी की दाईं तरफ पत्थरों के नीचे कुशल मूर्तिकार के हाथों तराशी गई मूर्ति की भांति सूंड की आकृति —बर्फ की बनी-इतनी स्पष्ट !इतनी सुन्दर !!श्री गणेश यह तो तुम हो !आंखें छलक आईं।थोडा आगे नजर गई तो देखा माता पार्वती की लगभग तीन फीट ऊंची बर्फ की आकृति  ,अधलेटी सी,जरा सा पांव पसारे हुए।लगा अभी अभी सोई हों। ऐसा ही तो है कथा का स्वरूप-वह कथा सुनते सुनते सो गई थीं॥उनके पांव के समीप ही लगभग 4-5 फीट लम्बी आकृति —दो पांव चट्टान पर लटके हुए—पीठ जरा ऊंची---नन्दी की प्रतिमा !!!
  पूरा का पूरा शिव परिवार ,पूरा का पूरा शिव दरबार
      साक्षात शिव के दर्शन ! यह दर्शन आंखों ने नहीं आत्मा ने किया ।
साक्षात परमात्मा का दर्शन !हम हाथ जोडे खडे रहे ।रोम-रोम कहता रहा-जन्म सफल हो गया प्रभु ,जन्म सफल हो गया !!हमारे एक साथी जो चौथी बार इस यात्रा पर आए थे।रो पडे—झर झर आंसुओं के साथ !उन्हें पहली बार ऐसा दर्शन प्राप्त हुआ था ,उनके मन की थाह तो शिव ही लगा पाए होंगे। अब हमने इधर उधर नजरें दौडाईं।कबूतरों का जोडा दीख पडा। पर्वत की पथरीली दीवार पर बने कोटरों में बैठते इधर से उधर उडते,चहकते आंखें धन्य हो गईं।कबूतरों के अलावा हमें भूरे रंग का पर्वतीय चूहा भी नजर आया जो आकार में खरगोश से दुगुना रहा होगा ।सीटी सी अवाज निकालता इस दीवार से उस दीवार पर तेजी से घूमता हुआ । 14000 फीट की ऊंचाई पर जहां वर्ष के दो महीने ही आबादी होती है,लोगों का आना जाना होता है,शेष 10 महीने बर्फ ही बर्फ रहती है कबूतरों और चूहों की उपस्थिति घोर आश्चर्य में डालती है ।कहां जाते होंगे ये बाबा बर्फानी के प्रस्थान के बाद ?कैसे रहते होंगे ?
क्या खाते होंगे?
     गुफा में जहां शिवलिंग के दर्शन हुए ठीक उसके ऊपर पत्थर की एक आकृति  -चित्रलिखित सी—गणेश की सांकेतिक आकृति --सूंड सी अंकित दीखी॥हमारे देवों में सबसे ऊंचा और प्रथम स्थान श्री गणेश का माना गया है ।यहां जहां प्राकृतिक  संरचना होती है वहां भी प्रथम पूज्य श्री गणेश का उच्च सिंहासन !घोर आश्चर्य !
कुछ भी असत्य मानने को मन तैयार नहीं होता ।कुछ भी कृत्रिम नहीं सब कुछ प्राकृतिक ,नैसर्गिक,सत्य ।सत्यम शिवम सुन्दरम की अधारभूत संकल्पना परिभाषित होती है कण-कण में।गुफा के ठीक सामने विशाल पर्वत श्रंखला हैजिसका शिखर सात फ्नों वाले शेष नाग के आकार का है ,बीच मे एक विशाल फन ।मंदिर की ओर मुंह किए और अगल –बगल तीन तीन छोटे फन जैसे विशाल पर्वत की शक्ल में स्वयं शेष नाग शिव के सम्मुख उनकी सेवा में तत्पर खडे हों।पूरे पर्वत पर सर्प की धारीधार आकृति  जैसे लिपटे हुए सर्प ने पत्थर का रूप ले लिया हो ।यहां से वहां तक कोई बनावट नहीं ,एकदम स्पष्ट और साकार छवि ।गुफा से अमर गंगा का जल प्रसाद स्वरूप लेकर हम लौट चले,उस पवित्र गुफा की माटी को माथे से लगाकर।
    हल्के भोजन के बाद हमारी वापसी यात्रा शुरु हो गई ।मन में अपार हर्ष और संतोषप्रद रोमांच लिए हम लौट चले ।अमरनाथ से बाल टाल तक की उतरती राह जितना नजरों को बांधती उतना ही पांवों को सम्भलने की हिदायत देती रहती है।
नजारे हर तरफ अनोखे और आश्चर्य चकित कर देने वाले ।कहीं कहीं जटा-जूट खोले शिव की ध्यानमग्न छवि का आभास होता जो संध्या की बेला में बडा ही अनूठा लगता ।कहीं नजरों को छोटे-छोटे देवगणों की शक्ल के पत्थर दीख पडते ।कहा भी गया है मानों तो देव नहीं तो पत्थर ! नजरें जब शिवमय हो गईं तो हर तरफ शिव के नजारे ही नजारे ॥बाल टाल तक की दूरी 16 किलोमीटर की है ।इस राह में कई सीधी चढाई और तीखे उतार एवं खतरनाक मोड मिले ।पांव बहुत सम्भालकर रखने होते हैं।कहीं कहीं तो बैठकर ,सरककर या रेंगकर उतरना पडा । कहीं कहीं रास्ता अत्यधिक संकरा और फिसलन भरा था ।लाठी टेकते हम एक एक पांव बढाते गए ।जगह –जगह पर हमारे सैनिक चौकन्ने खडे मिले ।एक सहयात्री ने बताया पिछली यात्रा के दौरान इन संकरे रास्तों पर ,जहां एक भी कदम गलत पडते ही आदमी हजारों फीट नीचे गिर सकता है,हमारे सैनिक कमर में रस्सी बांधकर लम्बी कतार में खडे थे ।यात्री उन रस्सियों का सहारा लेकर धीरे-धीरे उतर पाए थे । वाह रे हमारे सैनिकों का अदम्य साहस और सदा सर्वदा मदद को तत्पर हाथ !
     हल्की हल्की बारिश के कारण रास्ते फिसलन भरे हो गए थे,डगर कठिन हो गई थी । पग –पग पर सेना के जवानो ने हमारी हौसला आफजाई की ।उन्हें देखकर मन में साहस और स्फूर्ति का संचार होता ।धीरे-धीरे चलते हुए रात्रि के पहले प्रहर हम बाल टाल पहुंचे ।यहां भी लंगर की व्यवस्था थी ।रात्रि विश्राम के बाद सबेरे हम श्रीनगर की ओर लौट चले ।श्रीनगर-भगवान के श्री चरणों तले बसा नगर-स्वर्गिक सौंदर्य से भरा पूरा । चिनार देवदार की खूबसूरत छटा निहारते और प्रकृति   के अनुपम सौंदर्य का आंखें भर भरकर दीदार करते झेलम के किनारे किनारे हम सोनमर्ग के रास्ते श्रीनगर पहुंचे।शाम हमारी डल झील में शिकारे पर सैर करते हुए बीती ।मन ही मन फिर आने का संकल्प कर हम सबेरे की गाडी से जम्मू आ गए यहीं से हमारी वापसी का टिकट था ।
     वापस आने के लगभग सात –आठ दिनों के बाद ही अखबार में खबर आई बाबा बर्फानी अन्तर्ध्यान हो गए । हेलिकाप्टरों की आवाजाही और यात्रियों की सांसों की गरमी से पिघल कर वापस लौट गए ।
  फिर आना प्रभु !हमारे जैसे लाखों यात्रियों को दर्शन देने । अपने इस असार संसार पर अपनी कृपा दृष्टि डालने ।
       ओम नम: शिवाय !
        

Wednesday, 4 January 2012

अनकही

 

अनकही


कारू राम जी,आपके खाते में तो…बात पूरी करना अच्छा नहीं लगा…नजरें उठाई तो सामने 64-65 वर्ष के एक बुजुर्ग –सांवला रंग, लम्बा चेहरा, बडी-बडी आंखें, सीधा-सरल व्यक्तित्व और आंखों में न जाने क्या…कि अनायास आदर उमड आया । मैंने ‘ना” में सिर हिलाया और निकासी फार्म के साथ पासबुक वापस कर दिया…मतलब साफ था कि मांगी गई रकम खाते में नहीं थी…
हमारी शाखा (हज़ारीबाग) शहरी है, यहां न्यूनतम जमा राशि 500/=होनी चाहिए…वगैरह –वगैरह, सभी रटी-रटायी बातें हैं। सबकी सब बेमानी।यहां अधिकतम खाते पेंशनधारियों के हैं। बंधी बंधाई रकम महीने की आखिरी तारीख को जमा होती है और पहले सप्ताह में ही निकाल ली जाती है, और फिर --महीने भर इन्तजार…।
यही सत्य चित्र है, यही हकीकत है।कारू राम पता नहीं किस विभाग से रिटायर हुए हैं। उन्हें कुल 785/=पेंशन मिलता है। दो किस्तों में 700/= निकाल ले जाते हैं।शायद पिछले माह शेष राशि के साथ साथ कुछ ज्यादा ही ले गए तभी तो खाते में मात्र 35/= ही बचे हैं ॥और निकासी फार्म उन्होंने 200/= का भरा है।
मेरा ना का इशारा देखते ही लौट गए, न कोई सवाल न जिरह॥ काउंटर पर लम्बी कतार थी। शाखा से लगे 2 ए टी एम हैं, परन्तु भीड है कि कभी कम ही नहीं होती। 8 सिंगल विंडो भी हैं परन्तु ये कतारें सारा दिन ज्यों की त्यों ही दीखती हैं। कोई एक सवा घंटे के बाद सामने पुन: वही पासबुक…नजरें उठाई तो देखा वही कारू राम…इस बार फार्म में मात्र 100/= भरे गए थे, अब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ।
यदि पहली ही दफा पासबुक अपडेट करके दे देती तो बेचारे दुबारा तो नहीं परेशान होते !! मैंने खोलकर देखा तो पासबुक अपडेट थी। तो फिर…?? मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मैंने उनकी ओर देखते हुए धीरे से कहा—ऊंहूं ! इतना भी नहीं। और थोडी ग्लानि के साथ पुन: पासबुक लौटा दिया मानों रकम के नहीं होने में मेरी ही गलती हो। कतार अब भी लम्बी थी, पर थोडी कम।
35-40 मिनट ही बीते होंगे कि कारू राम जी फिर उपस्थित हो गए।इस बार फार्म 50/= का था।वही लिखावट…वही सबकुछ। मैंने कलम नीचे रख दिया। हथेलियों पर चेहरा टिकाया और सीधे कारू राम की आंखों में देखा…कई सवाल उठ रहे थे मन में।पर ज्यों ही निगाह मिली…रोमांच हो आया।पिता की उम्र के बुजुर्ग व्यक्ति…और उनकी आंखें डबडबाई हुई।जुबान खामोश पर भावातिरेक से हिलता हुआ चेहरा…कोई शब्द नहीं ,कोई शिकायत भी नहीं, कोई याचना भी नहीं॥ पर अन्तर में उठ रहे तूफान की स्पष्ट झलक निश्छ्ल आंखों में…न जाने कौन सी आफत आन पडी थी,न जाने कौन सी ऐसी जरूरत, ऐसी मुसीबत आन पडी थी…जिससे अहं से दमकता हुआ चेहरा आहत-सा दीख  रहा था…।
उन कातर अश्रु बूंदों में कुछ शब्द तैर रहे थे…कि उन्हें पैसों की जरूरत थी , सख्त जरूरत। मैं अपने मन की कचोट सह न सकी। एक पल भी विचार नहीं किया। क्या सही क्या गलत का तो ध्यान ही नहीं आया। धीरे से अपना पर्स उठाया, उसमें से 50/= का एक नोट निकालकर पासबुक के पन्नों में रखकर सामने बढा दिया। देखने वालों को एक झटके में समझ भी नहीं आया होगा कि क्या हुआ…और न ही सोचने –विचारने का समय था कारू राम के पास।
उन्होंने पासबुक थामा और लगभग दौडते हुए-से चले गए।राम जाने ऐसी क्या इमरजेंसी थी उन्हें॥ ऐसी घटना कोई पहली बार नहीं घटी थी कि बैलेंस कम होने के कारण पासबुक लौटाया जाए।परन्तु 25-26 वर्षों के कार्यकाल में मैंने ऐसा पहली बार किया। जरूरत पर किसी को 100-50 देना अलग बात है।जो भी हो।
कुछ पलों में ही सबकुछ सामान्य हो गया। कार्य चलता रहा। उस दिन महीने की 22 या 23 तारीख थी। 8-10 दिनों के बाद नया महीना शुरु हो गया।फिर पेंशन लेने वालों की कतार…हनुमान जी की पूंछ की तरह…लम्बी—अंतहीन। कोई 2 घंटे बीते होंगे कि सामने कारू राम का पासबुक आ गया।खाते में 750/= जमा थे। निकासी फार्म 350/= का भरा गया था।मैंने मुस्कुराकर सामने देखा…मतलब स्पष्ट था…पैसे आ गए खाते में। पेंशन के पैसे॥आपकी सारी उम्र के परिश्रम के पैसे।
आज चेहरे पर आंतरिक अहं की चमक…आंखों में आत्म विश्वास की झलक भी।
मैंने 100-100 के तीन और 50 के एक नोट के साथ पासबुक बढा दिया और दूसरे व्यक्ति की तरफ मुखातिब हुई। कारू राम जरा दाहिनी तरफ खिसक कर खडे हो गए। और तुरंत 50 का एक नोट निकालकर मेरी तरफ बढा दिया। बिना कुछ कहे…बिना किसी लाग लपेट के। वही हिलता हुआ चेहरा…अनगिनत भावों का मिला-जुला रंग। आंतरिक अभिमान से दीप्त।
बहुत अच्छा लगा। एक गरीब,ईमानदार,बुजुर्ग का मौन,मूक,सरल व्यवहार। एक श्रद्धेय उमर का आदरणीय व्यवहार।
मैंने कुछ नहीं कहा।कुछ कहते बना ही नहीं॥ आंखें भर आईं॥ अपने स्थान पर खडी हुई और हाथ जोड दिए। सर जरा-सा हिला दिया “ना”। और मेरी बात उन्होंने समझ ली।
पैसे वापस रख लिए और धीरे से मुड गए।मैंने इस घटना का जिक्र कभी कहीं नहीं किया।पर मेरे मन को कहीं गहरे तक छू गई यह बात।
जाने क्या बात थी-
               जो न कही गई,न सुनी गई
              पर कह दी गई और सुन ली गई
               ज्यों की त्यों……